लिखने की उन्होंने हमे यूँ उसकाया की अब लिखने मैं आनंद सा आने लगा. भले कोई ख़ास नहीं लिख पाते पर एक लत सी लगने लगी है. हर वक़्त ढूँढता हूँ कुछ लिख जावू. कभी कुछ रुमानियाँ, कभी दर्द तो कभी कुछ, तीन शब्दों मैं अपने मन की भड़ास निकाल ही लिया करता हूँ. कुछ दिनों से हम सोच रहे थे की अपनी बातें ही लिखना शुरू करू जैसे आत्म कथा लिखी जाती है. पर, लेखनी मैं ऐसी कोई दम नहीं थी. सो, हमने सोचा की क्यूँ न अपनी चौपाल पर घटते कथा को लेखनी मैं बदलना शुरू करू. कोई आत्म कथा नही पर संस्मरण तो हो ही सकता है.
Jul 3, 2011
Jul 1, 2011
एहसास ये कैसा है
एहसास ये कैसा है
न छुड़ा पाए दामन जिनसे
ये प्यास कैसा है?
लकीरें टेढ़ी मेढ़ी सी इन हाथों
को मिला जाने का ये
जिद्द कैसा है?
लबों पर सजी उन एहसासों का
किसी और एहसासों से
न मिटा देने का ये
जिद्द कैसा है ?
महकती सांसों से सजी उन एहसासों का
किसी और सांसों सेन मिटा देने का ये
जिद्द कैसा है ?
उँगलियों का उँगलियों से लिपटे उन एहसासों का
किसी और से न
लिपटने देने का ये
जिद्द कैसा है ?
Jun 2, 2011
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