आज उसी मंज़र में हूँ उसी माहौल में हूँ जहाँ कभी हम अपने जिंदगी के साथ सबसे हसीं पल जिया करते थे. कमरे में सब कुछ एक निश्चित जगह पर थे जहाँ उन्हें होना चाहिए एक सलीके से लगी हुई किताबे, सजी हुई एक एक सामान, कोने पर सजे हुए ताज़े रजनीगन्धा फुलो का गुलदस्ता, साफ़ की हुई हमारी जीत के मेडल्स, बंद टीवी, सब कुछ अपने सलीके से सजे हुए. . कमरे में आज वैसी ही मध्हम रौशनी करती हुई अन्गिनत से मोमबतिया सितारों से टिमटिमा रही हैं ...कमरे में एक कोने पर सजी हुई एक गद्दी, जिसने गलीचे को बड़े सालीनता से थाम रखा था और दीवाल के ओट लिए रंग बिरंगी गद्दियाँ जो हमारी बड़ी ही पसन्दीदा जगह हुआ करती थी. याद है यही वो जगह हुआ करती थी जहाँ हम जिंदगी के कई कई घंटे, अनगिनत पलों को यादगार बनाते थे याद हैं ना तुम्हे ...
देखों ना अभी वही गीत चल रही है जब तुमसे हमारी मुलाकात हुई थी..माहौल ना जाने क्यूँ आज भी वैसी ही है ...याद है वो गाना वो शब्द ....
ऐ ज़िंदगी गले लगा ले हमने भी तेरे हर इक ग़म को
गले से लगाया है ....
गले से लगाया है ....
हमने बहाने से, छुपके ज़माने से
पलकों के परदे में, घर कर लिया तेरा सहारा मिल गया है ज़िंदगी
ऐ ज़िंदगी ...
पलकों के परदे में, घर कर लिया तेरा सहारा मिल गया है ज़िंदगी
ऐ ज़िंदगी ...

