May 10, 2012

HAPPY 1ST BIRTHDAY TO CHAUPAL


बच्चे का जन्म होना और फिर पहले कदम का लेना, दीवारों के सहारे या कभी उनके चाहने वालों के हाथ थामे एक एक कदम बढ़ा कर चलना सीखना. खड़े होने की कोशिश, चलने की प्रयाश हैं ना एक सुखद अनुभव. एक अनुभव जो उसके चाहने वाले के दिमाग में शायद जन्म भर रह जाती है. ऐसा ही कुछ सुखद सी अनुभव आज मुझे हों रही है. आज के दिन ही शब्दों के दुनिया में एक पृष्ठ जन्मा था “चौपाल”. आज चौपाल की प्रथम जन्मदिवस है. आज चौपाल एक साल का हुआ. चौपाल का जन्म हर बच्चे के जन्म के तरह ही हुआ जहाँ बीज हमने बोया था पर एक-एक शब्दों का शृजन का श्रेय कहीं और नहीं Zin कों ही जाता हैं. Zin ही प्रेरणा थी चौपाल के जन्म का, Zin ही श्रोत हैं भावनाओ के जन्म का. Zin से ही जुडी कई बाते हैं. शुक्रगुज़ार हूँ ईश्वर का, सुप्त पड़े अपने एक बड़े हिस्से कों जिन्हें मैं कभी समझ ही नहीं पाया था उन्हें Zin ने उसकाया और बढ़ावा दिया. आज आपके सामने अपने भावनावों कों रख पाने की हिम्मत कर पता हूँ... शुक्रिया Zin....

Zin श्रेय थी शब्दों कों हलक से बाहर निकालने की तों http://www.indiblogger.in  कों श्रेय दूँगा, जिनके चलते अपने आप परखने का साहस कर पाया. ना केवल ये साईट मेरी पहली साईट थी जहाँ अपने चिट्ठों कों सजा सका बल्कि पहली बार किसी भी प्रतियोगिता में भाग लेने की हिमाकत कर सका. और पहले ही बार जीत गया. यूं समझिए की बच्चे ने कदम रखना सीखा ही था कि थामने के लिए पास एक दिवार मिल गयी और थाम कर खड़ा हों गया. पहले बार की जीत की खुशी तों है ही पर इस बात की खुशी ज्यादा हुई कि खुद कों एक अदना लेखक सा महसूस कर सका.. अपने आप का परिचय एक नए तरीके से कर पाया ...शुक्रिया http://www.indiblogger.in for making me believe in myself….

चौपाल शायद एक चिठ्ठे के तरह जन्म लेता और एक चिठ्ठे की मौत पा जाता, पर नहीं, साल भर में कई लोगों ने सराहा. अपने शब्द छोड़ एक प्रतिक्रिया के रूप में छोड़ गए. हाँ आज भी कम लोग हैं पढ़ने वालों के लिस्ट में, पर मैं जानता हूँ  यदि लिखने कि गुणवत्ता बढ़ा सकू, उन्हें और ढंग से सजा सकू शायद और लोग पसंद कर जाए..पर एक एक प्रतिक्रिया मेरे लिए बहुत मायने रखती है और आप लोगों का यहाँ आना ही मेरे लिए बहुत है... शुक्रिया दोस्तों...आपके एक एक शब्दों का मैं आभारी रहूँगा...और आपके आशीर्वाद चाहूँगा अपने चौपाल के लिए....

यदि हों सके तों जब कभी दुआ में हाथ आपके उठे, एक दुआ करे कि  ZIN, जो चौपाल कि जननी है, वो हमेशा खुश रहे और दुनिया कि सारी खुशियाँ उन्हें मिले...Amin!!!!!!!!!

ZIN....
आज तुम्हारे लिखे 
कुछ शब्दों की चाहत है 
अपने  शब्दों कों 
उन्मुक्त कर 
आज तुम  पहली बार अपने
चौपाल 
कों सजा जाओ....
शुक्रिया  शब्दों कों सजाने की  हिम्मत 
मुझे  देने के लिए
१०/५/२०१२

May 6, 2012

एक इन्टरनेट, एक मोबाइल

पांच सितारा होटल के कमरे में Sony Xperia  पर उँगलियों से खेलते-खेलते मन बात कौंधी कि कितना कुछ बदल गया है. हम भी बदल गए हैं समय के साथ-साथ, कभी दूर से किसी होटल कों देखते तों इच्छा होती कि कुछ पल के लिए ही सही एक बार ठहर कर देखा जाए कैसा लगता है. समय ने कैसी रूप धरी कि अब बस होटलों में कभी एक रात तों कभी दो और कभी हफ्ते भर रुकना आदात सी पड़ गयी.  दाल के सूप कों लेंटिल सूप कह कर हम बड़े चाव से अभी-अभी पी गए. घर में होते तों दाल देखते ही नाक-भौं बन जाती. सब कुछ बदल गया है और इस संसार में गर कुछ नहीं बदलता तों वो है बदलाव. समय का पहिया कही तेज तों कहीं मध्यम गति से घूमते रहता है. चमचमाती सड़कों में भागते दौड़ते गाड़ियों का लय तों रुकता ही नहीं. रुक कर कभी मन मुड़े कहीं तों, चमचमाने के नाम पर सिर्फ सितारे साथ चमकते है घुप रात के अँधेरे में. भागती गाड़ियों के सफर से जब भी मैं थम जाता हूँ तों अपने आप कों ढूँढने, अपने अस्तित्व कों बरकरार रखने चला जाता हूँ वहीँ जहाँ आज भी बिजली के खम्भे बिन तार के बरसों से पड़े हैं. ना कोई तार, ना उसमे से गुजरती बिजली. अँधेरे दूर से गर कोई घर चमकता दीखता है तों, उसके सम्पन्नता का आभास चमक से पहले पहुँच जाती है. नहीं ऐसा नहीं कि बिजली विभाग निक्कमी है या सरकार. मेरे गाँव के लोग ही माफिया सा बन, जब भी तार कों खम्भे से जोड़ते है रात के सन्नाटे में तार गायब कर जाते हैं.
हाँ, कुछ महीने ही अपने आप कों जोड़े रखने हम गाँव पहुँचे थे. गाँव में एक चाचा की बिटिया की शादी थी. बचपन से ही हमें बहुत मानते थे और हम उन्हें और उनकी बिटिया की शादी हों और हम ना पहुंचे. सुबह से ही सबका आना जाना घर पर था. शाम हुई तों पहुँच गए चौपाल. चहल पहल बढ़ गयी थी गाँव में.. दो ही तों हैं हम जो विदेश में रहते है. एक हम और एक बबलुवा. बबलुवा वही विकास जी. हम ही ले गए थे, बड़ा स्नेह हैं उस से. थोडा पढ़ा लिखा है. छोटी सी नौकरी दुबई में करता है. अब हम आये तों गाँव के सब आ जाते है. चौपाल महफ़िल सी हों जाती है. बातों बातों में ध्यान आया अँधेरे एक कोने में लजवंती भाभी बबुआ कों कमर में थामे खड़ी है. शरमाती है, इसलिए बुजुर्गों के सामने आ नहीं पा रही थी. मैं दौड के गया तों पैर छूने लगी. कुछ कही नहीं, बस एकटुक देखते रहीं. बबलूवा कों ढूंढ रही थी मुझमे. तीन बरस हों गए थे बबुआ पेट में था तब ही की बात है. बबलूवा कों हम दुबई भिजवा दिए थे कमाने. पूछे हम “का हुआ बबलुवा फोन नहीं किया का. काहे उदास हों? आ जाएगा गर्मी में अबकी.” कुछ नहीं बोली लजवंती. सर पर आँचल संभाले और कमर पर तीन साल का बवुआ कों थामे, सर नीचे कर एकटुक सा ज़मीं कों ताकते रही. खाली पैर दौड कर आई थी हमारे आने की खबर सुन. पैर के ऊँगली से जमीं खोद रही थी और आँखों से टपटप आंसू. व्याह के वक्त सोलह की थी अब उन्नीस कि हुई होगी. इतनी नन्ही सी थी लजवंती.  

Apr 22, 2012

पुरस्कार.. Awards...My Blog and Me

लिखना
कभी मेरी चाहत न थी..
कोशिश की भी
 जुर्रत न थी शब्दों के कुछ फेर कों
यूं कोई सराह गया
कि  लिखना
अब हमारी लत सी बन गयी...

सच पूछिए कभी कुछ लिखने की कोशिश ही नही की थी हमने. हाँ लिखने के कुछ शौक थे. स्कूल के दिनों में पेन-फ्रेंड्स बनाना, कुछ अपनी बातें करना और कुछ उनकी समझना. ज्यादा बातें होती थी कुछ अपने बारे में, कुछ उनके बारे में, कुछ शहर के बाते. बस लिखना इतने तक ही सिमित था. हाँ, हिंदी के मास्टर जी हमे बहुत पसंद करते थे. क्यूंकि मैं उन्ही की तरह था कुछ कुछ. वो सीधे तरीके से उत्तर देना और लेना दोनों नहीं पसंद करते. याद है एक बार ‘निराला’ साहब की एक कविता थी “वो तोडती पत्थर”. बड़ी सुन्दर कविता थी उसके बारे में किसी भी पाठक की भाव की गुन्जायिश कहाँ रहती थी. “निराला” साहब ने इतने सुन्दर ढंग से संजोया था. हम तों हम थे और मास्टर जी मास्टर जी. उन्होंने व्याख्यान लिखने कों दे डाला छमाही में. अंत में लिखा था उत्तर फुरसत से. जब परिणाम आया, उन्होंने पढ़ कर सुना डाला पुरे क्लास कों.. गदगद हों उठे थे शायद. उस वक्त भी ऐसा लगा की इतने घुमावदार भूमिका बाँधी है.. उन्हें मजा आ गया... क्लास के अंत में मजाक का मसाला मिल गया था..खुबे हँसे थे...

हमारे लिए लिखना एक ही बार पागलपन सा हुआ था जब अपने गर्ल-फ्रेंड कों पटाने की कोशिश में कुछ लिखता... प्रेम-पत्र “वेल्कम  टू सज्जनपुर” (हिंदी सिनेमा) के “महादेव (एस तलपडे) सी होती, बड़ी मादकता होती थी पत्रों में. पर विधि की विधान, प्रेम पत्र पढ़ कर पट तों गयी पर बाद में निरोत्शाहित कर डाला “कितने बड़े बड़े पत्र लिखते हों...कहाँ से चुराते हों..” वगैरह वगैरह ... यूं कहिये ‘जिसके लिए चोरी की वही  कहे चोर’ ..खैर प्रेम-पत्र का गयी पानी लेने. नौकरी के चक्कर में ऐसा फंसा की लिखने के नाम पर मेमो और क्लाईंट कों बिजनेस लेटर ही बच गयी...

कहते हैं जिंदगी एक घूमता पहिया है..चीजें लौट कर आती हैं..जिन से मुलाकात हुई. बहुत अच्छा लिखती है, और लिखने का एक ख्वाब भी सजा रखी है. पर सिर्फ अपने लिए लिखती  है.. उन्हें चिढाने के लिए अपने उलूल जुलूल शब्दों में व्यक्त करना शुरू किया..सयाने बनने लोग पकडे ही जाते हैं. सो पकड़ा गया... और उसकाते रही की मैं कुछ लिखू... कोशिश तों करू... और कोशिश कर रहा हूँ..
कोशिश कर रहा हूँ की कैसे भी उसके बराबरी का लिख पावू.. उस जैसे कविता कर पावू.. करीब तक नहीं पहुँच पाता..