Dec 10, 2012

The Straightening device – Kur’curla

 

   
Apatani lady

Human being is the  most unsatisfied living organism on the face of earth. Human being in their own human sphere wants to change what they have and attempt to achieve what they don’t have. They always crave for a little more of everything. When they are born they are the angels in skin and bones. When the wisdom grows in they love to change the way they are. Craving for changes became traditions and traditions became fashion. The change looked inevitable. The Kayan tribes of Burma wore those neck rings from the age of five to beautify their female. Whereas, Apatani tribe of our own land in Arunachal Pradesh, who were born so beautiful that they were the constant prey to the other tribes, de-beautified the woman folks by piercing-in their nose for those ugly nose rings.  French came with the concepts of Corsets to look slimmer on the waist. Change indeed was only constant throughout the Humane  life.

Dec 5, 2012

जलन ....... [Jealousy]

मेरी रचनायें ना जाने क्यूँ बचपन से एक रिश्ता बाँध कर ही आती है. हर रचना से बचपन का यूं बंध जाना बुरा नहीं लगता. लिखने कों वैसे कुछ था नहीं पर उंगलियां चटक रही थी. कुछ ना कुछ लिखने की इच्छा अठखेलियां ले रही थी. प्रेरणा ना जाने कहाँ घूँघट ओढ़े अलसाई सी सोई पड़ी थी. काफी हिलाया दुलाया फिर भी कुछ ना आई तों रहा ना गया ट्रेन के डब्बे में सवार हों बचपन के स्टेशन तक जा पहुंचा. वैसे तों राहों में कई उतार चढाव दायें बायें होती है, पर बचपन के इस स्टेशन पर आने का एक ही मार्ग है सीधा सपाट और नन्हा सा. जब चाहो यहाँ उतार आवो. याद है बचपन में पडोसी के यहाँ टीवी देखने जाता था. एक नन्हे से ड्राईंग रूम में ना जाने कितने लोग अट जाया करते थे. हाँ जगह भी कितना था चाचा जी के यहाँ, फर्श पर दरी, सोफा, दीवान, कुर्सी. कितना जगह होता था. फिर भी कम हुई तों कुर्सी मेज़ रूम से बाहर और तशरीफ की टोकरी का आगमन. हाहा बहुत ही प्यारे दिन थे. रिमोट भी नहीं होती थी. फिल्म शुरू हुई तों खत्म तक एक ही चैनेल. सारे विज्ञापन भी देखे जाते. एक से एक विज्ञापन आते. और कमरे के सभी बच्चे एक साथ गा उठते. चाहे वो टोबू साईकिल की विज्ञापन हों या निरमा के. सभी गाने याद रहते.
इन्ही विज्ञापनों में एक विज्ञापन बहुत याद आया. सर्फ़ वाली..हाँ वही ललिता जी वाली विज्ञापन. “उसकी साडी मेरे साड़ी से सफ़ेद कैसे? सर्फ़ के धुलाई में ही समझदारी है.” याद आई ललिता जी? लेकिन मैं ललिता जी पे तों लेख लिखने से रहा, लेकिन हाँ उस विज्ञापन में जो भाव थे बड़े ही इंट्रेस्टिंग थे. एक औरत दूसरे के साडी कों देख कर एक जला-भुना सा भाव व्यक्त करती है. हाँ मैंने इसी भाव कों पकड़ने की कोशिश की है अभी. जलन की भाव. कितना भी बेतुका लगे ये पर है बड़े काम की चीज़. जलन तों आग की लौ है जो धधके तों परवाने राख बना जाए और ना धधके तों परवाने कों राख कर जाए. ये तों परवाने के ऊपर है की धधकते इस लौ से कितना वो जले. हंसी, खुशी, दुःख कितने भाव हैं पर जलन या ईर्ष्या का जो एक रुतबा है क्या कहने.
जलन की उत्पति का कोई मूल परिचय तों हमे किसी ग्रन्थ में नहीं मिला क्यूंकि लोगों ने सुख या दुख के बारे में ही पोथियाँ बांची है, ग्रन्थ में तों इनकी भरमार है. पुरुष हों या नारी, ईस्वर हों या नश्वर, असुर हों या देव सभी ने बराबर सुख की कामना की है और दुःख से दूर रह पाने की दवा ढूंढी है. जलन का तों नाम ही नहीं है कहीं. अब इन्टरनेट के ज़माने में ग्रन्थ कों ढूंढे हम तों गूगल और याहू में इस बारे में शोध किये. कुछ ना मिला तों टीवी पर ही एक प्रोग्राम से मेरे सवालों का जवाब मिला. महादेव के एक भाग में महादेव शिव ही बतलाते है इस भाव के बारे में. चर्चा पार्वती माँ के साथ हों रही थी और विषय था सागर-मंथन के परिणाम का. मंथन में अमृत देवों कों, विश शिव ने पीया, श्री की उत्पति हुई. शिव जी का वक्तव्य था अमृत देवों कों इसलिए लिया दिया गया ताकि वे निर्व्हिक हों जन कल्याण करे. श्री की उत्पति लोक कल्याण और वैभव प्रदान करने के लिए हुई,  संसार के विश कों उन्होंने खुद पिया ताकि आकाश-पाताल, धरती सब सुखी रहे. पर, ये कुछ हुआ नहीं, अमृत पी देव घमंड से चूर हुए. जिन्हें जो नहीं मिला उसे पाने कों वो आतुर हों उठे. इन्द्र देव तक गौतमी के साथ छल कर गए. और सब हुआ ईर्ष्या के जन्म से. यहीं जलन ने जन्म लिया. और मख्य सूत्रधार बने शिव भगवान. शिवे शिवे ...
जलन हों गर आप में तों आप उसे पाने के लिए दौडेंगे. उसे मिटाने के होड में आप मेहनत करेंगे. जब आप उसे पा लेंगे तों किसी और चीज़ से जल उठेंगे. तों इस दौड में आपकी प्रगति तों निश्चित ही है ना. हाँ विवेक का जलन के संग होना आवश्यक है वर्ना सही और गलत जलन की भनक ना मिलेगी. अब हमे ही देखिये जलन  कों हमने इतना महत्व दिया अपने जिंदगी में की बहुत सपने पा गया. कई आज भी अधूरे हैं पर जलन के लौ कों धधकते रखा है.

अब आप पूछेंगे ये अचानक क्या उलूल जुलूल लिखा है जलन कों ले कर. ये भी कोई विषय है. सच पूछिए तों अचानक ही कल मैं जल उठा था. अब ये ना पूछियेगा क्यूँ और कैसे. हाँ जल उठा था मैं. ये जानता हूँ कि उस स्थिति में और उस काल में, मैं वक्त के उस नजाकत में, खुद कों समा नहीं पावुंगा. फिर भी, मैं कुछ सुन कर दिल पे उठे टीस और मन की पीड़ा दबाए, चेहरे पर मुस्कान सजाये एक वीर सेनानी की तरह सुनता बतियाता रहा. भले जलन से सारा तन जल उठा था. तभी ये बात मन में आई थी ... “इतना जलनखोर मैं कब से हों गया हूँ”. सच बहुत ईर्ष्या हुई थी कुछ बातों कों सुन कर... अब रहने भी दीजिए क्यूँ कुरेद रहे है.... नहीं बता पावुंगा...हाँ मेरी गलती तों ना थी जलन खोर बनने की सब तों शिव माया है सब महादेव की देन है ..हमे तों ना अमृत मिली ना ही सुंदरी..हमे तों जलना ही लिखा था.... सो जल उठे ....शिवे शिवे हर हर महादेव .. चलता हूँ आज के लिए इतना ही

Nov 18, 2012

काश कि मैं ....

जब मैं नन्हा सा था, नन्ही उँगलियों कों थाम कर लोग पूछते “बड़े हों कर क्या बनोगे?” कभी साफ़ ज़बान तों कभी तोतली ज़बान से अपने मन में जो आता कह देता की मैं क्या बनूँगा और हर बार उस वक्त उस दशा से प्रेरित हुई बातों से मिला जुला रहता. याद है जब ओलम्पिक गेम्स हुई थी तब मैं चिर परिचित मिशा भालू तक बनना चाहता था. रेल गाडी में बैठ कर ननिहाल पंहुचा तों ट्रेन का ड्राईवर बनने की चाहत रखता. रिक्शे वाला चाचा ने गाँव क्या घुमाया कि रिक्शा वाला बनने की मंशा रखने लगा. हर बार कुछ नया होता, हर बार लोग सुनते और मुस्कुरा देते. बनना हमारे हाथ में कहाँ था. सपने बनते बिगड़ते, और अंततः पिता जी की इच्छा से इंजिनियर बन गया. अब जब इंजिनियर बन गया, और अब जब कमाने की इच्छा भी धुंधली हों गयी है, धन से मोह भी कम हों गया है, इंजिनीयर बन कर भी कुछ और बनने का मोह कम ना हुआ. आज एक इन्सान बनने का मोह बढ़ गया है. हाँथ पैर मार रहा हूँ पर पता नही कब एक इन्सान बन पावुंगा..
इन्ही बनते बिगड़ते सपनों में कुछ सपने और जुड़े पर इन्सान बनने की सपने से पीछे ही रहे है....

काश कि मैं ...
काश कि मैं जुलाहा होता
रेशम के फली से
रेशम के सूत कों धार
घिरनी से घिरा
महीन सुतों का धार बनाता
करघे में चढा महीन धारों से
एक अंग-वस्त्र बनाता
वस्त्र में ढंकी वो मेरे
उँगलियों कों स्पर्श कर पाती
अंगोछे के छुवन से
मैं उनके नर्म अंग कों
महसूस कर पाता
काश कि मैं जुलाहा होता
काश कि मैं ....


काश कि मैं ..
काश कि मैं स्वर्णकार हो़ता
स्वर्ण की नन्ही गिट्टियों कों
गर्म कोयले की गिट्टियों से ढला
नन्ही नन्ही बूंदों की
सुन्दर एक पाजेब मैं गढता.
सुन्दर सजे पैरों में उनके
पाजेब कों मैं खुद सजाता..
हर एक डग से उनके
मंजीरों सी खनकती बूंदे
हर डग कों मैं सुनता रहता
हर डग कों मैं जीता रहता
काश कि मैं स्वर्णकार होता
काश कि मैं.....

काश कि मैं ...
काश कि मैं प्रेमी होता
अडिग
दिलेर
दृढ़
सबल एक प्रेमी होता
ह्रदय में प्रगाढ़ प्रेम कों
बाँहों में मैं भर लाता...
सुनी
वीरान
एकाकी
माथे पर उनकी
सिन्दूरी होली खेल मैं जाता
सिन्दूरी होली खेल मैं जाता

काश कि मैं इंशान होता
अपने सपने मैं खुद सजाता
काश कि मैं ....
काश कि मैं ....
१८/११/१२