Mar 24, 2012

I HAVE MURDERED MYSELF

चौपाल पर बैठा हुआ निश्छल, निशब्द, मौन अपने विचारों से लड़ता हुआ. सुबह की सन्नाटे में, आज चौपाल के पेड़ के पत्तों में भी कहीं सरसराहट ना थी. घोंसलों से निकलते चिड़िये भी आज मौन भाव से अपने घोंसलों से निकल कर दाना पानी के तलाश में निकल पड़े थे. मंदिर में भी कोई आवाज़ ना थी, पूजारी बाबा भी आज मंद भाव से मंत्र पढ़ रहे थे, ना कोई घंटी, ना कोई शंखनाद. इतने पास से भी पुजारी बाबा की कोई आवाज़ सुनाई नहीं दे रही थी. सूरज की किरणे अब भी चांदनी कों सजे रहने का  मौन संकेत दे रही थी. पेड़ के ओट लिए मैं, उदास पड़ा था. और, ये सब उदासी का कारण एक ही था – “आज मुझसे खून हुई थी, मैंने खून कर दिया है”. उदास था, पर विचलित नहीं. किसी तरह का छोभ नहीं, किसी तरह का दर्द नहीं, कोई पछतावा नहीं. एक हत्या हुई है और मैं विचलित तक नहीं? कैसे निष्ठुर बन गया हूँ? जाने कहाँ से आँखों में दर्द के दो आँसू आये और आखों के कोनों से निकल कर गाल तक भीग भीग कर लुढक गए. नहीं मैं दुखी नहीं था. हाँ खुशी भी नहीं, कि आंसू साथ देते. गौर से देखा, तों ये आंसू शायद अंतिम कुछ बूंद थे, जिन्हें मैं अपने आँखों से खदेड़ चूका था. उन्ही बूंदों की अतिम बूंद थी. भीगे हुए आसुवों कों सुखाने की कोशिश कर रहा था. पलकें जब खोली तों देखा, बाबा आये हुए थे - मेरे पिता. हाँ बाबा ही कहता था. बाबा जिंदगी के अंतिम पड़ाव पार कर चुके थे और वैकुंठवासी थे. पर ना जाने कैसे, जब भी मैं उलझन में होता, जब भी विचलित होता, बड़ी बड़ी उँगलियों से भरे हथेली से मुझे थामने आ जाते. वैसे कुछ दिनों से हमारी अनबन सी चल रही थी. कुछ मुद्दों पर गलत आशा दिखा बैठे थे तों मैं नाराज था. बाबा का यूं सहसा आ जाना, इस बार हैरान कर रहा था. नाराज़ नहीं हुए बाबा? इतना कुछ होने के बावजूद भी? पर कुछ नहीं पूछा मैंने उनसे,  ना ही कुछ कहा उन्होंने. दोनों ही मौन थे, भोर के आने से पहले की सन्नाटे सी.

“ये क्या है? क्या है सब कुछ?” सन्नाटे कों सरकाते मौन व्रत तोडा, उन्होंने. कोई आवाज़ नहीं आई रुंधे गले से मेरे, सुखी हुई आवाज़ कही बैठी हुई थी, गले से निकल ही नहीं पायी. बाबा ने नज़र दौडाया तो देखा, खून से लथपथ, कहीं खंज़रों के निशान थे, तों कही चोट खाए हुए. चोट के निशानों में, ज्यादातर अपनों के थे. अपनों के दिए हुए चोटों कों पहचान गए. एक लाश पड़ी थी, लाल रक्तों में डूबी हुई. कुछ नहीं कहा..एक टुक लाश कों, तों एक टुक मुझे देखते रहे. सूखे हुए आँसुवों की धार उन्हें बहुत कुछ बता रही थी. रात भर के जद्दोजहद का नतीजा ही था कि  मैं उसका खून कर गया. समझ गए थे, शायद. बोल उठे:

ये क्या किया पगले?
ऐसा भी कोई करता है?
ये साथ होती हैं तभी
हम, हम होते है
ना हों तों पत्थर से
निर्जीव निर्भाव होते हैं.
फिर क्यूँ मार डाला है तू इसे
क्यूँ आघात कर डाला
क्यूँ अपने भावनावो कों
स्वयं ही मार डाला?

Mar 13, 2012

चौपाल पर बाबा

चौपाल पर जब आज आया तों देखा बड़ी रौनक थी. ददुआ चाचा, सुखिया काकी, गंभीरा भाई, नयनतारा भाभी, बंगाली दादा और तो और मुथुआ भी आज चौपाल. गाँव उमड़ पड़ा था. हमे लगा कि हामी नहीं पहुंचे. अरे मिनीया और सुधाकर चाचा भी. खुद ही खुद पुछ बैठे कि हम काहे नहीं थे. थोडा इधर उधर तांक झाँक की तों पता चला चौपाल पर एक बाबा आये हुए थे. माजरा समझ आया अब काहे सब पधारे हुए हैं. ज्ञान जो पाना था. बाबा कों देखा बड़े ज्ञानी लग रहे थे. चेहरे पर शांत भाव, घुंघराले लंबे बाल, दाढ़ी बढ़ी हुई बात करते वक्त हिलने लगती. गेरुआ वस्त्र भी पहने होंगे सोचा पर ये क्या बड़े निराले है. एक सफ़ेद टी-शर्ट और लेविस के वोर्न आउट जींस, बगल में कैमरे कि स्ट्रिप और पास में ही एक होंडा कि बाईक. विस्मित हों सोचने लगे कि ये बाबा जैसे तों दिखते नहीं, फिर इतना माहौल क्यूँ बना? कोहनी मार के बंगाली दादा कों पूछे “ई का दादा, ई तों बाबा तों कहीं से नहीं लग रहे, तों इतना जमात किस बात की? और कौन हैं जो इतना भाव दिया जा रहा है?” बोलने लगे दादा “अरे इनका नाम तों निशान्तो है...” हम टोके “दादा निशांत होगा दादा निशान्तो नहीं”. दादा बोले :”हाँ हाँ एकी कोथा हाय. जानो बोहुत पोढा लिखा हाय इंजिनियर हाय. किछु दुखो हुआ सोब किछु छाड के बाईक ले कर निकोल गए. बोलते हैं कैमरा से फोटू तुलेगे आर दुनिया घूमेंगे. जिधार मों कोरेगा उधर घूमेंगे. लोगों से मिलेंगे नीजेर माफिक थाकेंगे. कोथा सुनो ना बोहुत भालो भाभे बुझाता हाय. इंगरेजी बोलता है हिंदी आर तों आर बंगाली भी जनता हाय”. बड़ी रोचक से बाबा लगे..निशांत बाबा...

Mar 12, 2012

एक खुली खत जिन के नाम....

जानती हों, अनजान सी पहचान प्रेम की हंडिया में, चाहत की गर्म लौ पर हौले हौले पक एक रिश्ते में परिवर्तित हों उठते हैं. और यही रिश्ते जीवन सफर के राह में सज जाते हैं. इन्ही राहों पर अनजान से दो लोग साथ साथ हमसफर बन जिंदगी के लंबी डगर नाप जाते हैं. डगर में उतराव हों या चढ़ाव, रिश्तों कों हमसफर बना दोनों पथिक भावविभोर हों पार कर जाते हैं. ऐसे ही डगर पर चलते चलते कब थक गया था पता ही नहीं चला. पलक झपकी तों पाया हमसफ़र कुछ कदम आगे था, थकी हुई कदम कों महसूस किये बिना.  क्लांत शिथिल मन, दुर्बल तन, रुधित कंठ, अश्रु पूर्ण नैन, घुटनों पर खड़ा जाते हुए देखते रहा. ना कोई आवाज़ लगायी ना कोई स्वर फुटा बस विस्मित हों देखता रहा स्वार्थ से परिपूर्ण उसकी तेज कदमें. गीली आँखें सुखी तों बहुत दूर निकल चला था मेरा हम सफर. और राह वही की वहीँ पड़ी थी बेजान रिश्तों सी. शांत हवा की मंद झोंको सी, शुष्क गर्मी में बरसात सी, तेज गर्मी में छाँव सी नर्म उँगलियों कों मेरे बालों में उंगलियां फिरोती तुम थी. हाँ तुम ही थी “जिन”. लंबी डगर में, उँगलियों कों अपने उँगलियों में सहेजे, थके माथे  कों अपने कंधे में संभाले, जुल्फों की छांव बिखेरती तुम ही थी “जिन”. कब सजे उस राह कों छोड़ मैं तुम संग एक नयी राह बना गया, एक नन्ही पगडण्डी जो काँटों से भरी थी, एक नयी राह. तुम साथ थी तों चलता ही गया रक्त रंजित हुए पग, घायल हुए तन पर तुम साथ थी, तों आह भी नहीं निकली एक बार भी. बस पथिक सा चलता गया.. जानती हों “जिन”, रिश्ते राहों से होते हैं, कभी टूटते नहीं खत्म नहीं होते, बस उनमें दोराहे होते हैं. कहीं ना कहीं हर राह एक दूजे कों काटते हैं मिलते हैं, और सारे राह कभी ना कभी पगडंडियों से ही शुरू होती हैं.   

क्या पता था, चलते चलते हमारी पगडण्डी वही राह के सामने खड़ी हों जायेगी. दोराहे पर एक बार वही हमसफ़र आंधी कों ओट लिए मुझे साथ उड़ा ले जाएगी. आज फिर वहीँ राह पर मैं हूँ और विस्मित सी खड़ी रह गयी तुम, पगडण्डी की उस कोने में. टीले के मुंडेर पर बैठा मैं देख पा रहा, पीछे छोड़ आये क़दमों के अपने छाप कों. आज भी पगडण्डी पर चमकते नगीनों से हमारे कदम चमक रहे हैं. आज भी तुम्हारे कदमों की छाप मेरे क़दमों के साथ सजते हैं..आज भी संकरी सी छोटी पगडण्डी डगर की सबसे खूबसूरत है आज भी खुशी वहीँ सजी है. राह भले बदल गए हैं, पर ना जाने क्यूँ ऐसा लगता है कि कहीं ना कहीं एक दोराहा फिर सजेगा, और फिर एक पगडण्डी राह बनेगी. डरता हूँ समय का वेग तुम्हे उड़ा ना ले जाए कहीं...