चौपाल पर सबेरे सबेरे आया तों देखा की भभुआ के पंडित जी का बिजनेस कार्ड पड़ा हुआ हुआ था. देखा तों पास ही में पंडित गिरधारी लाल का साईकिल भी खड़ा था. पूजा पटरी का गट्ठा था लगा हुआ यानी की गिरधारी भईया यही कही हैं..देखा तों मंदिर से चुटिया कों बांधते चले आ रहे थे. कार्ड ध्यान से देखा तो उसमे ईमेल और वेब-साईट भी था मोबाइल नंबर के साथ. हाँ, बच्चों कों पढाया लिखाया था शहर भेज कर, तों पंडिताई में भी कुछ आधुनिकता तों आनी ही थी. चुटिया बाँधा और पीले रंग के कुर्ते से अपनी स्मार्ट फोन निकाली और लगे कुछ करने. पास आये तों कोतुहता से हम पूछ ही बैठे “का गिरधारी भईया, बड़ी मोबाईल ले कर घुमते हैं?” कहने लगे “ भाई हम कों तों पता ही नहीं था इसके बारे में. जब से बिटवा सब सजा गया है हमारी जजमानी तों बढ़ गयी है.. अब तों गाँव छोडिये शहर से लोग पूछने लगे हैं.” हामी भरी हमने, गिरधारी भईया कहने लगे “ जानते हों आशु, अच्छा हुआ भगवन के ज़माने में ऐसा कुछ नहीं था मोबाईल-सोबाईल. नहीं तों बड़े बड़े काव्य नहीं लिखे जाते ...अरे आवुर छोडिये, रामायण, रामचरित मानस, गीता कुछो नहीं होता. हम पंडितों का कोई पंडिताई रह ही नहीं जाता.” जोर जोर से हसने लगे और साईकिल उठा कर निकाल पड़े.
अब इंजिनियर का वैज्ञानिक दिमाग, और कोतुहल ऐसे कैसे शांत होए. हम लग गए सनधान में. हाँ बात में तों दम थी गिरधारी भईया के. अब आप ही देखिये, ऋषि वाल्मीकि ने रामायण तों लिखी लोगों के पल्ले नहीं पड़ी क्यूंकि संस्कृत में थी. अब इन्टरनेट या मोबाइल रहता लोगों के पास तों गूगल (google) में जाते और और अनुवाद कर लेते. जो समझ जाते वो ब्लॉग बना अपने हिसाब से समझा जाते. रामचरित मनास की तों जरूरत ही नहीं पड़ती, बेचारे तुलसीदास कों पुश्तैनी काम जारी रखना पड़ता या पंडिताई करनी पड़ती. राम जी के बाबा दशरथ के तीन पत्निय ना होती क्यूंकि कौशल्या जी कों उनके सोसल नेटवर्क पर कड़ी नज़र होती. दो व्याह से पहले हंगामा तों हुआ होता...खैर, ये तों पिताश्री का हश्र होता. राम जी का व्याह भी यूं नहीं होता. लक्षमण जी की पैनी नज़र सीता स्वयम्बर के मेल चैन पर कहीं ना कहीं जरूर पड़ता. सीता पर नज़र उनकी पहली पड़ी थी पर भईया ने भांजी मार दी यह कह कर “भईयवा पहिले हमार बारी”. लक्षमण जी पहले ही वेब-साईट पर अपने प्रतियोगिता में शामिल होने का आवेदन डाल चुके होते तों राम जी के भाजी मारने का सवाल ही नहीं उठता. जनक जी बे-मतलब शिव जी के धनुष पर खोटी नज़र नहीं डालते और ना ही धनुष टुटा होता.. अरे इतने सुन्दर धनुष कों तों बिन टूटे “हेरिटेज स्टेटस” दे दिया जाता. जनक जी उदघोषण करते “जो भी अपने स्मार्ट फोन से हमारे वेब-साईट कों हेक कर दे, उनका व्याह सीता के साथ होगा. सीधा प्रसारण www swaymbar_of_seeta डाट काम से होगा. और आप दूर टेलीफोनी से भी आप प्रतियोगिता में शामिल हों सकते हैं. सीता जी के बारे में जानने के लिए यही वेब साईट पर जाए.” देश क्या समुन्दर पार से भी सीता के उपयुक्त वर प्राप्त होते. राम ना मिलते तों सीता भी खुश होती. वनवास ना जन होता नहीं धरती में डाह करना पड़ता...



