Feb 13, 2014

मंथन....

वासुकी बधित मंदरा से  
source: google images..

देव असुरों का   
मंथित होता
अथाह गहन समुद्र...

प्रगाढ़ समाधी गर्भ से
पृथक होते बार बार ..
हलाहल, अमृता
सुरभि, चन्द्र, धनवंतरी..

पृथक होते
अर्थ,  अनर्थता से
धीरता, अधीरता से
शांति, अशांति से

पृथक होते  
आशा, निराशा से
मृत्यता, अमरत्व से
ऐश्वर्य, दारिद्रता से

मंथन है प्रतीक
विचारों के कोलाहल का   
बौधित्व के समाधी में बध
आशा निराशा का घोर मंथन का 

विचारों के मंथन में  
समाधी के मौनत्व पर
क्यूँ हो कोलाहल
क्यूँ करूँ मैं कोलाहल..


……………………… In Respect of  a silence…..

बदलाव...

किसी ने कहा था “हर पांच वर्षों में लोग बदल जाते हैं”. सोचा.... तो, बात कभी सही तो कभी गलत के पल्लों में झूलते पाया. पल्लों के धुरी में विश्वास रखता हूँ मैं....
Credit: Link




सूर्य को
उदय से अस्त होते
चन्द्रमा को
अनेक कलावों में रूप  
बदलते देखा है...

पतझड़ को
बसंत से गुजर
बरसात में भीगते
शरद के बाँहों में
सिमटते देखा है...

बचपन को
किशोर में बढ़ कर
जवानी में मदमस्त हो
बुढ़ापे से हिलते  हुए
शुन्य में ढलते देखा है...

ईर्ष्या को
संतोष से शांत होते
दुखों के उफान को
खुशियों में ढलते.
हंसते खिलखिलाते देखा है...

बदलाव गर
प्रकृति की नियम है
बदलाव के इस अनुराग में
प्रकृति को
कभी बदलते नहीं देखा है
  
गर,  बदल जाओ आज तुम कभी
गर,  बदल जाए सलूक काभी
गर,  बदल जाए परिवेश कहीं  
गर,  बदल जाए काल भी कभी
नहीं बदलेगा तुम से प्रेम कभी  
ना बुझेगा तुम्हारे प्रति तमक कभी    (तमक=PASSION)

प्रकृति की संतान हूँ और,
प्रकृति की देन हमरा प्रेम है,
प्रकृति की भेंट हो तुम,
हमारी ज़िन्दगी हो तुम
और बहुत प्यार है तुम से ...  


Love You Tonss… Happy Valentine’s Day..

Feb 6, 2014

हमराह...

धडकनें हैं
hamrah
धड़कने सुन पा रहा हूँ मैं  

हलचल है  
हलचलें भांप पा रहा हूँ मैं

सक्रिय हो
सक्रियता महसूस कर पा रहा हूँ मैं

खामोश हो
ख़ामोशी से खुद को व्यर्थ होता देख रहा हूँ मैं...

अपने को
तुम्हारे ख़ामोशी से बुझता हुआ देख रहा हूँ मैं...

क्यूँ हो खामोश न पूछूँगा...
ज्ञात है कि मैं तुम्हारे प्रश्न का जवाब नहीं
ज्ञात है कि मैं तुम्हारे प्रश्न का हमराह नहीं......