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Thursday, December 22, 2011

रूठे हैं मौला

जब प्यार को किसी हालात से खो देते हैं तों न ही सजदा सूझता है न ही पूजा... प्रेम ही धर्म लगता है और प्यार ही पूजा...
एक कोशिश....






ना मंदिर मे दीप जली
ना बजी है घंटी कोई
ना सजदे मे हाथ जुड़े
ना झुका  हैं माथा

ना मैं जाता मंदिर कोई
ना कोई मस्जिद काबा
ना मैं हिंदू ना मैं मुस्लिम
ना मैं ठहरा सीख ईसाई

नास्तिक नहीं मैं
हूँ मैं आस्तिक  
मैं भी जन्मा एक पुजारी
करता मैं भी पूजा

प्रेम मेरा है सजदा पूजा
प्रेम हैं मंदिर काबा
प्रेम की ही वंदन मैं करता
प्रेम की ही पूजा

फंसा   भंवर मे
बिखरी कस्ती
छुट गयी है मेरी कस्ती
छोड़ गया मैं पाला

छोड़ आया खुदा को हमने
रूठ गया सब जग सारा
रूठे गए हैं खुदा भी हमसे
भूले हैं हमे मौला

किन हाथों से सजदा पाऊ
कैसे दीप और घंट बजाऊ
रूठे हैं मौला जब मेरे
कैसे उनको मैं मनावु...  




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लिखना कभी मेरी चाहत न थी..
कोशिश की कभी जुर्रत न थी
शब्दों के कुछ फेर की कोशिश
यूं कोई सराह गया की
लिखना अब हमारी लत बन गयी...
-------- दो शब्द ही सही आपके,
शब्द कोई और करिश्मा दिखा जाए--- Leave your comments please.