Dec 19, 2011

लटकती तलवार

Inspired from a poem by ZIN…..I love her a lot..



हम हमेशा से कहते हैं कि जिंदगी दो धारी तलवार के नीचे टिकी है ...गिरी नहीं कि जीवन समाप्त..उसी दो धारी तलवार से एक बार मुलाकात हुई ..शब्दों के ताने बाने से सजी ये मुलाकात.......





शुन्य  सी अधियारे मे
शांत  मन से
लटकती तलवार से मुलाकात हुई ...
पुछा जब मैंने उनसे
क्यूं हर वक्त,
सूत की कमजोर धागों  से बंधी
जीवन के बोझ  से दबी
 हमारी नाज़ुक कपाल पर
लटकती रहती हो?

डरावनी सी डर बन कर
हर वक्त क्यूँ डरती रहती हो?
दो धारी शरीर को अपने
तेज से खूबसूरती झलकाती
खूबसूरत बला तों हो
फिर हमे हर पल डरती क्यूँ हो?
जीवन का ये बोझ क्या कम है
जो तुम भी हम पर
लटक पल पल डराती हो ?


रुखसत हुई, कहा नादान हो
क्या तुम पागल हो?
जीवन-अर्थ कि समझ  नहीं तुम्हे?
हमारी साथ को देखो
हमारी मोल को समझो
हमारी रूप से न डरो
दो धारी शकल से भय न करो
हमे जब समझोगे तभी
हमसे प्यार कर पावोगे.
वर्ना जिंदगी भर यूँही
हमसे डरते रह जाओगे  

ढूंढो हमे
समझो हमे
प्यार हमसे करो
वो समझती गयी, सुनाती गयी
सुनो अब तुम समझो अब तुम
जिंदगी के पलों को
जब भी तुमने पाया है
एक हरकत से काट हमने ही
झोले मैं तेरे डाला है.

जन्मे थे जब तुम
ईश्वर के अंग से काट हमने
माँ के ममता भरी आँचल मे   
पीता के स्नेह भरे गोद मे
मैने ही तुम्हे पहुँचाया है
उँगलियों को थाम जब
चलने की  सीख तुमने सीखी थी
धारा के गिरफ्त से हमने ही
अपने तेज धारों से छुडाया था

पेड़ की छावं मे
प्रेमिका की उँगलियों से
अपनी उँगलियों को पिरोये
जब जब बाँहों मे उसे
तुमने थामा था
हजारों आत्माओं के भीड़ से
तेरी प्रेमिका को हमने अपने
इन्ही लंबी बाँहों से ढूंड निकाला था
सुनी पड़ी तुम्हारी तन्हाई को
जिंदगी से हमने ही मिलाया था
मैंने ही अँधेरे से तेरे पलों को
अनगिनत रंगों से सजा डाला था

जहाँ भी ढूँढोगे हमे मौजूद पावोगे
रिश्तों मे,  नातों मे
सूख मे  दुःख मे
हार हो या जीत मे
मेरे होने का एहसास पावोगे
जो भी, जब भी, जिसे भी
तुम्हारी ईछावों ने चाहा है
ईश्वर की चाह से
किस्मत के इज़ाज़त से
हमने ही उन्हें काट के दिलाया है

बात मे दम थी
तलवार की कथनी मे जोर थी
मैं सुनता गया
दलीलें मानता गया
मूक सा बन सुनता ही गया..
पर अचानक कुछ सोच,
ठिठुर सा गया
उसे झूठलाने की
उसे शिकश्त देने की
बहाने धुन्दता गया
कहीं तों होगी जहाँ ये
पैनी अपनी धार से हमे मरेगी
कभी तों रक्तिम कर
दुःख पहुंचायेगी



मुस्कुरा कर हमने कहा तलवार से,
अंत काल जब आएगा
तब तों तुम हमे मरोगी
लटकती हुई तुम
हम पर आवोगी
उस पल तों हम तड़प जायेंगे
जीत कर उस दिन तों तुम
अट्टहास कर पवोगी
उस पल ये बहलाने वाले
बहाने कहाँ सुना पवोगी.

तलवार भी कहाँ मानाने वाली थी
हंस पड़ी मुझ पर एक तेज से
लहरा उठी ...नादान हो कितने तुम
नासमझ हो आज भी तुम,
इतने पलों के बाद
इतनी परवरिश के बाद
कोई भी कैसे किसी को
दुःख पहुँचा पायेगा?
नादान सुन एक बार फिर ध्यान से
आखरी पल मैं तों
हमारी आखरी भेंट होती हैं  
तुम्हारे इस नश्वर शारीर से
आखरी मुलाकात होती हैं

हमारी लंबी लंबी बाहें
और पैनी मेरी धार सब मिल
तुम्हारे नश्वर जर्जर शारीर से विदा लेते हैं
काल के आग्रह पर हम
तुम्हे तुम्हारे नश्वर शरीर से
हम तुम्हे तुमसे विदा देते हैं..
ये तों हम हैं कि तुम्हे
इस कठोर, दुखो से परिपूर्ण
जीवन रूपी सजा से
आजाद करा जातें हैं
पवित्र पावन आत्मा को
धरा से मुक्त कर
ईश्वर कि आत्मा मैं
विलीन कराते हैं

ईश्वर कि आत्मा मैं  तुम्हे विलीन कराते हैं
फिर कैसे  हम तुम पर लटक तुम्हे डराते हैं
फिर कैसे  हम तुम पर लटक तुम्हे डराते हैं

written a year back ...........

1 comment:

  1. very nice poem

    and i like the background color of your blog

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लिखना कभी मेरी चाहत न थी..कोशिश की कभी जुर्रत न थी
शब्दों के कुछ फेर की कोशिश ---यूं कोई सराह गया कि
लिखना अब हमारी लत बन गयी...
-------- दो शब्द ही सही,, आपके शब्द कोई और करिश्मा दिखा जाए--- Leave your comments please.